सकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि परंजॉय गुहा ठाकुराता और के
श्रीनिवास रेड्डी की जांच पड़ताल में 61 उम्मीदवारों ने इस बात को माना था
कि उन्होंने अपने पक्ष में ख़बर छपवाने के लिए पैसे दिए थे.
इतना ही नहीं समय के साथ पेड न्यूज़ का तरीक़ा भी बदल रहा है और अब यह ज्यादा संगठित तौर पर सामने आ रहा है.
परंजॉय
गुहा ठाकुराता कहते हैं, "जब हर तरफ़ पीआर की चीज़ें बढ़ती हुई दिख रही
हों तो इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है. राजनीतिक दलों के पास इन चीज़ों के लिए एक पूरी टीम काम कर रही होती है. अब नेताओं के पास अपना पीआर
मैकेनिजम है. पीआर एजेंसियां ऐसी सुविधाएं मुहैया कराने का दावा कर रही
हैं. अख़बारों और चैनलों में इन लोगों से बात करने के लिए मार्केटिंग का
विभाग मुस्तैद रहता है."
प्रभात ख़बर के बिहार संपादक अजेय कुमार
कहते हैं कि पत्रकारों और संपादकों के सामने जो पत्रकारिता की नैतिकता से
जुड़े सवाल होते हैं वो सवाल उसी पैनेपन के साथ अख़बार प्रबंधन को चुनौती नहीं लगते हैं क्योंकि उनके लिए अख़बार और चैनल भी एक प्रॉडक्ट ही हैं.
वहीं
वरिष्ठ टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई कहते हैं, "चैनल और अख़बार निस्संदेह एक प्रॉडक्ट हो गए हैं, लेकिन प्रॉडक्ट में पेड न्यूज़ की धोखाधड़ी तो नहीं
होनी चाहिए. अगर आप पैसा लेते हैं तो उसे साफ़ और स्पष्ट तौर पर विज्ञापन
घोषित करना चाहिए."
पेड न्यूज़ का बाज़ार कितना बड़ा है, इसका अंदाज़ा मिंट अख़बार में प्रकाशित भारतीय चुनाव आयोग के हवाले से 2013 में लगाए गए एक आकलन
से होता है जिसके मुताबिक, कोई राजनीतिक दल चुनावी दिनों में पार्टी और
उम्मीदवारों के लिए जो ख़र्च करता है, उसका क़रीब आधा हिस्सा पेड न्यूज़ के लिए होता है.
चुनाव आयोग के सख़्ती दिखाने का असर बहुत ज़्यादा भले न
दिखा हो लेकिन ये संदेश तो जा रहा है कि वह पेड न्यूज़ की शिकायतों को गंभीरता से ले रहा है.
इस मामले में उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता डीपी यादव की पत्नी उमलेश यादव का उदाहरण भारतीय राजनीति का पहला मामला था जब किसी विजयी उम्मीदवार
को अयोग्य ठहराया गया. 2007 के विधानसभा चुनाव के दौरान उमलेश यादव बदायूं
के बिसौली विधानसभा से निर्वाचित हुई थीं.
राष्ट्रीय परिवर्तन दल की
उम्मीदवार उमलेश यादव से चुनाव हारने वाले योगेंद्र कुमार ने प्रेस
काउंसिल में उनके ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई. कुमार ने अपनी शिकायत में
बताया था कि दो प्रमुख हिंदी दैनिक- दैनिक जागरण और अमर उजाला- ने मतदान से ठीक एक दिन पहले उमलेश यादव के पक्ष में पेड न्यूज़ प्रकाशित की थी.
हालांकि
पेड न्यूज़ की शिकायत पर दोनों अख़बार प्रबंधन का दावा था कि उन्होंने उस ख़बर को विज्ञापन के तौर पर छापा था और ख़बर के साथ 'विज्ञापन' ( ) भी
लिखा हुआ था.
प्रेस काउंसिल ने शिकायत और अख़बार प्रबंधन के जवाब के बाद अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जिस तरह के फॉरमैट में ख़बर छपी थी और जिस
तरह से
उमलेश यादव के बाद मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान सरकार में ताक़तवर मंत्री नरोत्तम मिश्रा को भी चुनाव आयोग ने पेड न्यूज़ में संलिप्त पाते हुए तीन साल तक उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी थी.
हालांकि बाद में
नरोत्तम मिश्रा को दिल्ली हाईकोर्ट से राहत मिल गई. नरोत्तम मिश्रा पर
2008 के विधानसभा चुनाव के दौरान पैसे देकर अपने पक्ष में ख़बरें छपवाने का
आरोप लगा था. में नरोत्तम मिश्रा के ख़िलाफ़ दतिया विधानसभा से चुनाव हारने वाले
कांग्रेस उम्मीदवार राजेंद्र भारती ने चुनाव आयोग में याचिका दाख़िल की. इस
याचिका में उन्होंने आरोप लगाया कि मिश्रा ने पेड न्यूज़ पर जो ख़र्च किया
है, उसे चुनावी ख़र्च में शामिल नहीं किया है.
इसके बाद चुनाव आयोग
ने मामले की सुनवाई शुरू की और जून 2017 में नरोत्तम मिश्रा को अयोग्य
ठहराते हुए उनके चुनाव लड़ने पर तीन साल की पाबंदी लगा दी.
छपा हुआ था उससे आम मतदाताओं के मन में भ्रम पैदा होने के
आसार बनते हैं. चुनाव एक दिन बाद होने थे और प्रचार पर रोक लग चुकी थी ऐसे
में यह न केवल पत्रकारीय मानक के तौर पर ग़लत है बल्कि चुनावी प्रावधानों
का भी उल्लंघन है.
इसके बाद ही 20 अक्टूबर, 2011 को तीन चुनाव
आयुक्तों की कमेटी ने 23 पन्ने के अपने फ़ैसले में उमलेश यादव की सदस्यता को अयोग्य ठहराते हुए उन पर तीन साल तक चुनाव नहीं लड़ने की पाबंदी लगा दी
थी.
उमलेश यादव की सदस्यता को ख़ारिज़ होने को परंजॉय गुहा ठकुराता
एक बड़ा बदलाव मानते हैं. उनके मुताबिक इससे कम से कम ये संदेश तो गया है
कि पेड न्यूज़ में अगर फंसे तो गंभीर नतीजा देखने को मिल सकता है.
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