Wednesday, 2 January 2019

वाराणसी में अभ्यास करते युवा ब्राह्मण

जैसा कि मैंने अपनी किताब में लिखा है, अगर भारत की आबादी को समझना है तो ऐसा मान लीजिए कि यह एक पित्ज़ा है. भारत के शुरुआती लोग, जिन्हें पहले भारतीय या फ़र्स्ट इंडियंस कहा जाता है, वे इस पित्ज़ा का बेस हैं. इस पित्ज़ा का बेस कुछ हिस्सों में बाक़ी हिस्सों की तुलना में पतला है. फिर भी यह बाक़ी पित्ज़ा के लिए एक बेस की तरह काम कर रहा है क्योंकि अध्ययन बताता है कि भारतीयों की जेनेटिक्स में 50 से 65 प्रतिशत का हिस्सा फ़र्स्ट इंडियंस का है.
इस बेस के टॉप पर सॉस है जो पूरे पित्ज़ा पर फैली हुई है. इस सॉस को आप हड़प्पा सभ्यता मान लीजिए. फिर टॉपिंग्स और चीज़ का नंबर आता है. तो ये ऑस्ट्रियाई-एशियाआई, तिब्बती-बर्मी और भारतीय-यूरोपियन भाषा बोलने वाले या आर्य हैं. ये वो लोग हैं जो बाद में भारतीय उपमहाद्वीप में आए.
हिंदू दक्षिणपंथियों में कई को ये बातें पसंद नहीं आएंगी. वे तो स्कूलों का सिलेबस बदलने और वहां पर आर्यों के बाहर से आने का ज़िक्र हटाने को लेकर अभियान चलाते रहे हैं. ट्विटर पर इतिहास की बात करने वाले कई प्रसिद्ध दक्षिण पंथी हैंडल भारत के उन प्रमुख इतिहासकारों को निशाना बनाते रहे हैं, जो आर्यों के बाहर से आने के सिद्धांत का समर्थन करते हैं.
अगर हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए यह स्वीकार करना बहुत मुश्किल है कि आर्य भारत के पहले निवासी नहीं थे और हड़प्पा संस्कृति उनके आने से पहले से मौजूद थी.
इसका मतलब यह मानना होगा कि भारतीय सभ्यता का उद्गम आर्यों या उनकी वैदिक संस्कृति में नहीं बल्कि कहीं और है.
मीडिया में हाल ही में भारत के मानव संसाधन राज्य मंत्री सत्यपाल सिंह का बयान छपा था, जिसमें उन्होने कहा था, "हमारे बच्चों को सिर्फ़ वैदिक शिक्षा ही विकसित कर सकती है और उन्हें मानसिक अनुशासन वाले देशभक्त बना सकती है."
हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए विभिन्न समूहों के मिश्रण का विचार भी पसंद नहीं आता क्योंकि वे नस्लीय शुद्धता को ज़्यादा तरजीह देते हैं.
ऊपर से बाहर से आने की थ्योरी आर्यों को बाद में भारत पर अधिकार करने वाले मुस्लिमों, जैसे कि मुग़लों की ही श्रेणी में डाल देती है.
ये सिर्फ़ सैद्धांतिक बहस नहीं है. देश की राजधानी दिल्ली से सटे हरियाणा में सत्ताधारी बीजेपी सरकार ने मांग की है कि हड़प्पा सभ्यता का नाम बदलकर सरस्वति नदी सभ्यता कर दिया जाए. चूंकि शुरुआती चार वैदिक ग्रंथों में सरस्वति नदी अहम नदी है, ऐसे में इसका नाम इस्तेमाल करने से सभ्यता और आर्यों के बीच संबंध मज़बूत होगा.
नया अध्ययन इन चर्चाओं पर विराम लगाता है और यह हिंदू दक्षिणपंथियों के लिए झटका है. सत्ताधारी पार्टी के सांसद और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रोफ़ेसर सुब्रमण्यन स्वामी ने इस अध्ययन के सह लेखक प्रोफ़ेसर रेक पर एक ट्वीट के ज़रिये हमला करते हुए लिखा है, "इसमें झूठ हैं, घिनौनै झूठ और (हार्वर्ड की तीसरी रेक एंड कंपनी के) आंकड़े हैं."
हालांकि नए रिसर्च से जो असली संदेश निकलता है, वह बहुत रोमांचक और आशापूर्ण है. वो ये कि भारतीयों ने विभिन्न वंशों और इतिहासों से एक चिर-स्थायी सभ्यता का निर्माण किया है.
भारतीय सभ्यता का सबसे अच्छा गुण समावेश करना यानी सबको अपने में मिलाना रहा है, न कि बहिष्कार करना. विविधता में एकता असल में भारत के अनुवांशिक ताने-बाने की आत्मा है.